काश के वो मुझे कभी मिले ही ना,
पर उसके ख़्वाब उसके ख़याल हमेशा रहें।
वो मेरे पास कभी हो ही ना,
और मैं अपनी ज़िंदगी उसकी ख़्वाहिश मैं गुज़ार दूँ।
मैं उसके दर पर भटकता रहूँ,
पर वो दरवाज़ा मेरे लिए कभी खुले ही ना।
क्यूँकि जो मज़ा माशूक़ के रुसवा होने मैं है,
वो उसे हासिल करने मैं कहाँ?
मैं इस बात से ख़ुश राहु के वो मोहब्बत-ए-ज़िंदगी थी,
कोई जलवा-ए-जुनून तो नहीं ।
फिर सालों बाद हादसे से वो मुझे मिले,
और उस हादसे से वो मुझे मिलें।
फिर मेरे ख़्वाब उसकी हक़ीक़त बन जाएँ,
और मेर हक़ीक़त उसके ख़्वाब बन जाएँ।
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